तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें

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Monday, January 17, 2011

प्रमुख उपनिषद : परिचय ----------------------------------------------- विश्वमोहन तिवारी पूर्व एयर वाइस मार्शल

कभी विश्व गुरु रहे भारत की धर्म संस्कृति की पताका,विश्व के कल्याण हेतू पुनः नभ में फहराये!- तिलक

प्रमुख उपनिषद : परिचय



प्रवेश

वेदों का चरमोत्कर्ष उपनिषद हैं। अतएव हिन्दू धर्म का मूलाधार भी उपनिषद हैं वरन बौद्ध जैन तथा सिख धर्मों में बीजरूप या पूरे वृक्ष रूप में भी उपनिषद उपस्थित हैं। यद्यपि उपनिषदों का मान्य विषय अध्यात्म या आत्मा–परमात्मा है वास्तव में उनका विषय ‘अनन्त सुख यहां और अभी’ है। यह कहना अधिक सही होगा कि अनन्त सुख की खोज करते करते उन्होंने ‘सच्चिदानन्द’ पा लिया वही आत्मा तथा वही परमात्मा है।

वेदों की संख्या चार है : ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद तथा अथर्ववेद। समस्त वैदिक साहित्य श्रुति भी कहलाता है क्योंकि यह श्रुत सुना हुआ परम्परा से ही प्रसारित हुआ था। प्रत्येक वेद के चार भाग हैंः संहिता या मंत्र ब्राह्मण आरण्यक तथा उपनिषद। ‘संहिता’ अर्थात मंत्रों का संकलन भाग में अग्नि वरुण आदि देवों की स्तुतियां हैं सृष्टि के वर्णन हैं इत्यादि। अग्नि वरुण आदि देव वास्तव में उच्च गुणों के प्रतीक हैं। ‘ब्राह्मण’ भाग में यज्ञानुष्ठान की विधियां इत्यादि हैं। ‘आरण्यक’ भाग में वाणप्रस्थियों के लिये वन में जीवन शैली की यज्ञ तथा उपासना करने की विधियां आदि हैं आत्मा तथा परमात्मा प्रकृति मृत्यु माया मोक्ष आदि का चिन्तन मनन हैं।

कुछ मूलभूत प्रश्न हैं जो हम सभी के मन में कभी न कभी उठते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर सरलता से नहीं मिल पाते अतएव अधिकांशतया हम उन प्रश्नों को छोड़ देते हैं। उनमें से कुछ प्रश्न हैं – मैं कौन हूं यह विश्व या ब्रह्माण्ड क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? क्या इसका कोई रचयिता है? मनुष्य के मनुष्य से क्या सम्बन्ध हैं प्रकृति से क्या सम्बन्ध हैं? रचयिता यदि हैं तो क्या सम्बन्ध हैं? हमारे जीवन का ध्येय क्या है? इन उत्तरों के आधार पर ही जीवन के मूल्य निर्धारित किये जाते हैं तथा इन पर सुख या दुख की प्राप्ति निर्भर करती हैं अतएव इनकी सही जानकारी अत्यंत आवश्यक है। इन प्रश्नों के उत्तर उपनिषद में मिलते हैं।

उपनिषदों को वेदान्त भी कहते हैं क्योंकि एक तो वे वेद के अन्तिम भाग हैं दूसरे जो कि महत्त्वपूर्ण है उनमें जिस ‘सुख’ या ‘ज्ञान’ की खोज वैदिक ऋषियों का ध्येय था वह उन्हें प्राप्त हो गया।वह आनंद या ज्ञान जिसे 'सच्चिदानन्द' की संज्ञा दी गई ही ब्रह्म है।यह परम शाश्वत ज्ञान उन ऋषियों को प्राप्त हो गया उनकी खोज एक तरह से पूर्ण हुई।कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि अन्तिम सत्य की खोज अभी तो नहीं ही हुई है . और जो कहते हैं कि अन्तिम सत्य की खोज हो गई है वे भ्रम में हैं और किसी रूढ़ि का पालन कर रहे हैं। हमें उन्हें क्षमा कर देना चाहिये ऐसा कहने के लिये क्योंकि वे नहीं जानते ‘सच्चिदानन्द’ क्या है।. इसकी खोज वैज्ञानिक खोज सरीखी नहीं है कि एक ने कर ली और प्रमाणित हो गई तो किसी अन्य को करने की आवश्यकता नहीं। ‘सच्चिदानन्द’ की खोज प्रत्येक व्यक्ति को करना है तभी वह जानेगा कि ‘पड़ोसी को क्यों प्यार करना है सत्य क्यों बोलना है चोरी या हत्या क्यों नहीं करना है दूसरों की सहायता क्यों करना है इत्यादि। फिर उसे किसी धार्मिक ग्रन्थ के आदेश की भी आवश्यकता नहीं रहती। ऐसे जीवन के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जिन प्रश्नों के उत्तर विज्ञान नहीं दे सकता वह ब्रह्मज्ञानी अपने आत्मज्ञान के अनुभव से जानता है। इनमें ब्रह्मविषयक दार्शनिक ज्ञान है। अधिकांशतया उपनिषद स्वतंत्र न होकर ब्राह्मणों या आरण्यकों के अंतिम भाग हैं।

उपनिषद में अध्यात्म की बौद्धिक व्याख्याएं या प्रकृति या ब्रह्माण्ड पर चर्चाएं नहीं हैं। ऋषियों ने जो तप स्वाध्याय चिन्तन–मनन तथा साधनाएं की थीं वह सब भी उपनिषदों में सूत्र रूप में मात्र ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की किसी विधि का ज्ञापन करने के लिये ही हैं। इन सब साधनाओं के फलस्वरूप उनको जो आत्म–दर्शन हुआ सच्चिदानन्द की जो अतीन्द्रिय अनुभूति हुई और जो सच में वर्णनातीत है उसका बिम्बों रूपकों आदि की सहायता से काव्यात्मक अर्थात ‘ज्ञात से अज्ञात’ का वर्णन उपनिषदों में है। सच्चिदानन्द या आत्मा का साक्षात्कार भावातीत है अर्थात मन तथा इन्द्रियों के परे है किन्तु यह साक्षात्कार किसी भी साधक के द्वारा इस संसार में रहते हुए मन की चौथी अर्थात तुरीय अवस्था में अनुभूत किये जा सकते हैं।

यदि तर्कसंगत बात करें तो यह कहा जा सकता है कि यदि वह सच्चिदानन्द का साक्षात्कार वर्णनातीत है तब ऋषियों ने उसका वर्णन कैसे कर दिया। वे ऋषि उस अनन्त सुख की अनुभूति को मात्र अपने तक सीमित नहीं रख सकते थे। अचानक ही उस अनुभूति से उनके लिये सहसा इस सृष्टि का रहस्य खुल गया मानव के मन की गाँठें खुल गईं। स्वर्ग तथा नरक का अर्थ भी मिल गया।आनन्द और सुख और दुख का अर्थ स्पष्ट होगया। उपरोक्त मूलभूत प्रश्नों के उत्तर उन्हें प्राप्त हो गये। वे उस अनुभव को तो नहीं बाँट सकते थे किन्तु उसे प्राप्त करने की विधियों का तो अवश्य ही वर्णन कर सकते थे तथा उस साधना के पथ में किस तरह भटका न जाए इसका वर्णन भी कर सकते थे और साथ ही वह सच्चिदानन्द जिसे ब्रह्म की संज्ञा दी गई क्या नहीं है इसका भी वर्णन कर सकते थे और उपरोक्त मूलभूत प्रश्नों के उत्तर भी दे सकते थे। भिन्न ऋषियों ने भिन्न उपनिषदों में यही किया।

ऋषियों ने उपनिषदों में आत्म–साक्षात्कार हेतु इतनी सामग्री अवश्य दी है कि साधक की बौद्धिक जिज्ञासाओं की तुष्टि हो सके और वह उस रहस्यमय पथ पर चलते हुए भटकने से बच सके। किन्तु विधियों का इतना वर्णन उनमें नहीं है कि साधक आत्म साक्षात्कार कर सके। यह सीमा तो उनके नाम उपनिषद में ही अभिव्यक्त है। उपनिषद का मुख्य अर्थ होता है ‘निकट तथा नीचे बैठकर ऋषियों से ज्ञान प्राप्त करना अर्थात गुरु के पास बैठकर ही इन उपनिषदों को समझा जा सकता है तथा उनसे दीक्षा ले कर आत्म–साक्षात्कार या सच्चिदानन्द की दिव्य अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। उपनिषद के इस अर्थ की पुष्टि उपनिषदों यथा बृहदारण्यक के 2 .6 और 4 .6 ब्राह्मणों में ब्रह्मा आदि गुरुओं तथा शिष्यों की सूची दी गई है जिन्होंने यह परम्परा स्थापित की। उपनिषद का एक और अर्थ है ‘अज्ञान का नाश’ और ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति जो स्वयं ही स्पष्ट तथा सटीक है। अर्थात ब्रह्मज्ञानी को भी उपनिषद कहते हैं।

मुक्तिकोपनिषद के अनुसार एक सौ आठ उपनिषद हैं। किन्तु अनेक ग्रन्थों के अनुसार 108 से भी अधिक उपनिषद हैं। आदि शंकराचार्य ने 788 से 821 ईस्वी जो कि पिछले 2000 वर्षों में सम्भवतया सर्वोत्कृष्ट भारतीय दार्शनिक माने जाते हैं दस उपनिषदों पर प्रदीप्त एवं प्रेरणात्मक टीकाएं लिखीं वास्तव में वे उस समय लुप्त हो रहे इस ज्ञान को पुनः प्रकाश में लाए। अतएव वही दस उपनिषद आज प्रमुख माने जाते हैं। आदि शंकर ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य में पाँच अन्य उपनिषदों–श्वेताश्वतर कौषीतकि जाबालोपनिषद महानारायण तथा पिंगल उपनिषदों की भी चर्चा की है। अतएव कुछ विद्वान इन पन्द्रह उपनिषदों को प्रमुख मानते हैं।

हिन्दू शास्त्रों में मनुष्य के चार पुरुषार्थ माने गए हैं – धर्म अर्थ काम तथा मोक्ष। मनुष्य को धर्म के अनुसार आचरण करते हुए संसाधनों का अर्जन करना है ताकि वह अपनी कामनाओं की यथा संभव पूत्र्ति कर सके तथा जीवन के लक्ष्य मोक्ष को अन्ततः प्राप्त करे। पहले तीन पुरुषार्थ तो वेदों के पहले तीन भागों के विषय हैं। मोक्ष जिसका भी आधार धर्म है वेदान्त का विषय है। यह टिप्पणी सटीक ही होगी कि आज की शिक्षा पद्धति जो कि पाश्चात्य शिक्षा पद्वति के आधार पर गठित की गई है चार पुरुषार्थों में से मात्र दो पुरुषार्थों – अर्थ तथा काम – की शिक्षा देती है उसमें भी कामनाओं की अधिकांश क्षिक्षा हमारा दुर्भाग्य ही समझना चाहिये बाजारू विज्ञापन देते हैं।

यह विचार मन में आ सकता है कि उपनिषद जीवन के महत्त्वपूर्ण दो पुरुषार्थों – अर्थ तथा कामनाएं – का निषेध तो नहीं कर रहा है। नहींं वे इन दोनों पुरुषार्थों का पूरा समर्थन करते हैं। वे बार बार कहते हैं कि मनुष्य को इसी संसार में रहते हुए धर्माचरण अनुसार संसाधनों का अर्जन कर कामनाओं की यथासंभव पूत्र्ति करते हुए अकाम होकर सुखी होते हुए ही मोक्ष की प्राप्ति करना है। मोक्ष का मान्य अर्थ तो जीवन–मरण के चक्र से मुक्ति है किन्तु मेरी समझ में मोक्ष का अर्थ इस सांसारिक जीवन में दुखों की निवृत्ति तथा अनन्त सुख की प्राप्ति है। कठोपनिषद के उपान्तिम मंत्र में स्पष्ट कहा गया है – “जैसे ही मनुष्य की कामनाओं से मुक्ति होती है वह अमरता प्राप्त करता है तथा उसका ब्रह्म से साक्षात्कार हो जाता है अर्थात यहीं अनन्त सुख की प्राप्ति ।. चूँकि कामनाओं से मनुष्य की मुक्ति साधारणतया असंभव है। एक कामना की पूत्र्ति होते ही अनेक नवीन कामनाएं हृदय में वास करने लगती हैं। अतएव ऋषि कामनाओं की पूत्र्ति करते हुए लगातार सुख प्राप्त करने को असंभव सिद्ध करते हैं अतएव कामनाओं पर बुद्धि का नियंत्रण करते हुए इस संसार में सक्रिय रहते हुए कामनाओं से मुक्ति को आत्म–साक्षात्कार के लिये आवश्यक मानते हैं।

एक दो तथ्यों को स्पष्ट करना आवश्यक है। चूँकि उपनिषदों का ज्ञान यद्यपि ऋषि देते हैं उस ज्ञान को अपौरुषेय माना गया है। कई विद्वान इसका अर्थ लगाते हैं कि वह ‘ज्ञान’ उन ऋषियों को ब्रह्म या ईश्वर ने उद्घाटित ह्यरएव्एालतेिन्हृ किया। यह अर्थ यदि बारीकी से परखा जाए तो सही नहीं है क्योंकि वास्तव में ज्ञान प्राप्त करने की वह प्रक्रिया ‘आत्म–साक्षात्कार’ ह्यरएाल्ठिातेिन्हृ है। अर्थात आत्मा तो ‘है’ अज्ञानवश ही उससे साक्षात्कार नहीं हो रहा है। उस अज्ञान का अंधकार हटते ही ‘ज्ञान’ का प्रकाश मिल जाता है अर्थात आत्म साक्षात्कार हो जाता है। जब कोई अन्य है ही नहीं तब कौन किसका उद्घाटन करेगा ।. किसी अन्य ने किसी अन्य का उद्घाटन नहीं किया जैसा कि उद्घाटन ह्यरएव्एालतेिन्हृ के लिये आवश्यक है वरन किसी ने ‘स्वयं’ को अनुभूत किया – वह ज्ञान किसी व्यक्ति ने उत्पन्न नहीं किया वह ‘है’ – उसका साक्षात्कार ह्यरएाल्ठिएहृ किया अतएव इस ज्ञान को अपौरुषेय कहते हैं। अपौरुषेय का एक अर्थ यह भी है कि पुरुष उसे अपनी इन्द्रिय–मन बुद्धि द्वारा प्राप्त नहीं कर सकते। इस अर्थ में आत्मज्ञान पुरुष स्वयं प्राप्त नहीं कर सकता। उसे पुरुष की इन्द्रिय–मन–बुद्धि की सीमा के पार जाकर ही चौथी अवस्था में आत्म–दर्शन हो सकता है। साक्षात्कार की इस प्रक्रिया को ‘दर्शन’ कहते हैं और ऐसे ग्रन्थों को जो इन पर चर्चा करते हैं उन्हें भी ‘दर्शन’ कहते हैं। उपनिषद आध्यात्मिक अनुभवों की अमृत धाराएं हैं जिनमें डुबकी लगाने से शुद्ध चेतना या ‘सच्चिदानन्द’ की स्थिति में पहुंचा जा सकता है। जो इस अनुभूति को प्राप्त करता है उसे ‘सत्य’ ह्यरएाल्तिय्हृ का बोध हो जाता है उसे अनन्त सुख की प्राप्ति हो जाती है और वह इस संसार में उस सुख को सभी को उपलब्ध कराना चाहता है।

उपनिषद अनन्त सुख प्राप्त करने का विज्ञान हैं कला हैं तथा कौशल हैं। वे विज्ञान हैं क्योंकि वे अनुभव से प्रारम्भ होते हैं उन अनुभवों का विश्लेषण कर एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया जाता है तत्पश्चात भविष्यवाणी की जाती है जो कोई भी व्यक्ति स्वयं अनुभूत कर उसे सिद्ध कर सकता है। वह अनुभूति उपकरणों द्वारा नहीं मापी जा सकती यद्यपि शरीर पर पड़ते तद्जनित प्रभावों को मापा जा सकता है। साधक को अपनी अनुभूति पर उतना ही विश्वास होता है जितना सूरज के प्रकाश पर तथा इस अनुभूति के फलस्वरूप उसकी जीवन दृष्टि में उदात्त परिवर्तन होते हैं जिन्हें कोई भी देख–परख सकता है। यह सब सच होने के साथ यह भी सच है कि उस भावातीत अनुभूति का वर्णन असंभव है क्योंकि वह अनुभूति मन की तीन अवस्थाओं – जाग्रत स्वप्न तथा सुषुप्त – के परे चौथी अवस्था में होती है। आत्मानुभूति की अभिव्यक्त की इस सीमा को समझने के लिये किसी जन्मान्ध को कोई भी रंग समझाने का प्रयत्न करिये। वह समझ ही नहीं सकता। जिस तरह जन्म से अंधे को हम रं नहीं समझा सकते उसी तरह बिना चौथी अवस्था की अनुभूति वाले को हम ‘सच्चिदानन्द’ नहीं समझा सकते। इस वर्णननतीत अनुभूति को प्राप्त करने के लिये उपनिषदों का पठन आदि पर्याप्त नहीं हैं ज्ञान–प्राप्त गुरु ही साधक को सही मार्ग समझा सकता है। यह जानकारी देना कि ब्रह्म क्या नहीं है सरल तो है ही उपयोगी भी है।

उपनिषदों का प्रमुख वर्णित विषय तो एक ही है ब्रह्म किन्तु सभी उपनिषद विशिष्ट हैं क्योंकि भिÙ ऋषि उसे भिÙ शैली में प्रस्तुत करते हैं। किन्ही उपनिषदों में यथा छान्दोग्य में ‘आत्म ज्ञान’ के विकास को समझाया गया है – अÙ प्राण मन विज्ञान तथा आनन्द को क्रमशः आत्मा समझते हुए अन्ततः सच्चिदानन्द ही सत है आत्मा है का ‘ज्ञान’ हुआ। और इस ज्ञान के फलस्वरूप मनुष्य प्रकृति तथा ब्रह्म के बीच सम्बन्धों की व्याख्या हुई है। हिन्दू नीतिशास्त्र का आधार तथा सामाजिक मूल्यों के आधार भी यही मूल तत्त्वों की समझ है।

आत्म–ज्ञान का आधार व्यक्ति की तुरीय अवस्था की अनुभूति ही है आत्मज्ञान चेतना की चौथी स्थिति से प्रारंभ होता है तथा और गहराई में जाता है। अतएव आत्मज्ञान के अनुभवों में भी स्तर हो जाते हैं। इसीलिये कोई ज्ञानी द्वैत अर्थात आत्मा तथा परमात्मा की अनुभूति अलग अलग करता है और द्वैतवादी बन जाता है। जो ज्ञानी चेतना की उस अवस्था में पहुंचता है जहां आत्मा–परमात्मा तो एक हो जाते हैं सारा ब्रह्माण्ड भी वही ‘एक’ में स्थित दिखाई देता है – इस स्थिति में वह ‘अद्वैत’ ही देखता है। किन्तु ‘ब्रह्म’ की सत्ता के विषय में किसी को संदेह नहीं है। वे यह निष्ठापूर्वक कहते हैं कि ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति।’ अर्थात सत या जो ‘है’ वह एक ही है विद्वान उसका वर्णन भिÙ भिÙ विधियों से करते हैं।

उपनिषद प्रमुखतया ज्ञान मार्ग के साथ कर्मयोग कर प्रतिपादन करते हैं। उपनिषदों में विद्या तथा अविद्या कर्म तथा मुक्ति परिवर्तनशील ब्रह्माण्ड तथा निश्चल ब्रह्म आदि जैसे विरोधों का अद्भुत सामञ्जस्य है।

आज विश्व में भोगवाद तेजी से बढ़ रहा है किन्तु उससे अपेक्षित सुख उतना नहीं बढ़ रहा है वरन तद्जनित दुख भी बढ़ रहा है। भोगवाद में मनुष्य वस्तुओं का तो अबाध भोग करना ही चाहता है दुखद सत्य यह है कि वह अन्य मनुष्य को भी भोग की ही वस्तु मानकर उसका भी भोग करना चाहता है जो निश्चित ही सर्वत्र दुख पैदा करता है। अमेरिका में भोगवाद चरमसीमा पर है उत्साहवर्धक तथ्य है कि वहां अध्यात्म की भी प्यास बढ़ रही है। ब्रह्म–साक्षात्कार करने पर मनुष्य दुखों से और इच्छाओं से भी मुक्त हो जाता है वह केवल एक कत्र्तव्य पर चलना चाहता है – मनुष्य मात्र को दुखों से मुक्त कर अनंत सुख के मार्ग पर गमन कराना। वह अनंत सुख या अनंत आनन्द ऐसा है कि उसमें से अनन्त सुख निकालने पर भी अनन्त सुख शेष रहता है ईशावस्योपनिषद – शांतिपाठ। उस ब्रह्मज्ञानी को वह ज्ञान प्राप्त हो जाता है जिससे यह सारा विश्व जाना जाता है मुण्डकोपनिषद –3

अनेक आधुनिक विद्वान उपनिषदों को बिना समझे पुराना कहकर उसे तारीख–बाहर घो्षित कर देते हैं। किन्तु यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि लगभग 3000 वर्षों पुराने उपनिषद विश्व प्रसिद्ध विद्वानों दार्शनिकों यथा शोपैनहावर पोल डायसन मैक्समुलर टी . एस . इलियट विवेकानन्द विलियम जोन्स अरविन्द महात्मा गान्धी जोसैफ कैम्पबैल आदि आदि के प्रेरणा स्रोत रहे हैं। और यह सब तब हुआ है कि जब हिन्दू धर्म किसी का धर्म–परिवर्तन कराने में विश्वास नहीं करता और कि जब पिछले एक हजार वर्षों वह परतन्त्र रहा है। इसकी सफलता का एक कारण यह भी है कि यद्यपि वह मानता है कि शाश्वत ज्ञान का हजारों वर्षों पहले ऋषियों को ‘दर्शन’ हो गया था तथापि वह कहता है कि प्रत्येक मनुष्य को उस ज्ञान का दर्शन स्वयं करना चाहिये और यह भी घोषित करता है कि ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’। इस दृष्टि से वह आत्मपरक होते हुए भी वैज्ञानिक दृष्टि रखता है। तभी प्रत्येक नवीन युग में उसमें नवीन सटीक अर्थ प्राप्त होता है। उपनिषदों की विशेषता यह है कि उनका ज्ञान किसी भी संप्रदाय के भीतर सीमित नहीं रहता और न जाति या रंग या विचाधारा पर निर्भर करता है। वह मानव मात्र के लिये उपयोगी है।

उपनिषदों का ज्ञान मानवीय आदर्शों तथा नीतिशास्त्रों को वैज्ञानिक आधार देता है जो कि पाश्चात्य नीतिशास्त्रों को पाश्चात्य दार्शनिक नहीं दे पाते। यूनान में सौक्रेटीज़ की एक घटना का उल्लेख वननैस – श्री भट्टाचार्य प्रकाशक – मोतीलाल बनारसी दास दिल्ली उचित होगा। यह घटना यूनानी विद्वान यूसेविउस ने लिखी थी ‘यूनान के संगीतज्ञ अरिस्टोजे.नुस ने इसका उल्लेख किया था। वे सौक्रेटीज़ की शाला में उनका व्याख्यान सुन रहे थे कि एक हिन्दू भी वहां आकर बैठ गया। जब व्याख्यान समाप्त हुआ तब औपचारिकताओं के बाद उस हिन्दू ने सौक्रेटीज़ से प्रश्न किया “आपके दर्शन का विषय क्या है?” सौक्रेटीज़ ने तपाक से उत्तर दिया “निश्चय ही मानव मन की खोज।” सुनकर वह हिन्दू हँस पड़ा और बोला “आप दिव्य के ज्ञान के बिना मानव मन को कैसे समझ सकते हैं।”

क्रमश: ईशावास्य उपनिषद

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