तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें

कभी विश्व गुरु रहे भारत की धर्म संस्कृति की पताका, विश्व के कल्याण हेतू पुनः नभ में फहराये कभी श्रापित हनुमान अपनी शक्तिओं का विस्मरण कर चुके थे, जामवंत जी के स्मरण कराने पर वे राक्षसी शक्तियों को परास्त करते हैंआज अपनी संस्कृति, परम्पराएँ, इतिहास, शक्तियों व क्षमताओं को विस्मृत व कलंकित करते इस समाज को विश्व कल्याणार्थ राह दिखायेगा युग दर्पण सार्थक और सटीक जानकारी का दर्पण तिलक (निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण मीडिया समूह YDMS 09911111611, 9999777358.

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बिकाऊ मीडिया -व हमारा भविष्य

: : : क्या आप मानते हैं कि अपराध का महिमामंडन करते अश्लील, नकारात्मक 40 पृष्ठ के रद्दी समाचार; जिन्हे शीर्षक देख रद्दी में डाला जाता है। हमारी सोच, पठनीयता, चरित्र, चिंतन सहित भविष्य को नकारात्मकता देते हैं। फिर उसे केवल इसलिए लिया जाये, कि 40 पृष्ठ की रद्दी से क्रय मूल्य निकल आयेगा ? कभी इसका विचार किया है कि यह सब इस देश या हमारा अपना भविष्य रद्दी करता है? इसका एक ही विकल्प -सार्थक, सटीक, सुघड़, सुस्पष्ट व सकारात्मक राष्ट्रवादी मीडिया, YDMS, आइयें, इस के लिये संकल्प लें: शर्मनिरपेक्ष मैकालेवादी बिकाऊ मीडिया द्वारा समाज को भटकने से रोकें; जागते रहो, जगाते रहो।।: : नकारात्मक मीडिया के सकारात्मक विकल्प का सार्थक संकल्प - (विविध विषयों के 28 ब्लाग, 5 चेनल व अन्य सूत्र) की एक वैश्विक पहचान है। आप चाहें तो आप भी बन सकते हैं, इसके समर्थक, योगदानकर्ता, प्रचारक,Be a member -Supporter, contributor, promotional Team, युगदर्पण मीडिया समूह संपादक - तिलक.धन्यवाद YDMS. 9911111611: :

Thursday, January 14, 2010

Vekatesh Aarti TirumAlA se sAbhAr

कौशल्या सुप्रजा राम ! पूर्व संध्या प्रवर्तते ,उत्तिष्ठ ! नारासर्दुला ! कर्तव्यं देवं अह्निकम . उत्तिश्ठोत्तिष्ठ ! मनोहर गोविंदा ! उत्तिष्ठ गरुडध्वजा ! उत्तिष्ठ कमलकान्त! त्रैलोक्यंमंगलम कुरु. मतससमस्तजगतमधुकैटभअरेह्वाक्सोविहारिणी ! मनोहर-दिव्यमूर्ते ! श्रीस्वामिनी ! श्रीतजनप्रिय -दानासिले  ! श्रीवेंकटे सदायिते ! त्वसुप्रभातम त्वसुप्रभातम  अरविन्द लोचने ! भवतु प्रसन्नमुख -चन्द्र मंडले ! विधि शंकरेन्द्र -वनिताभीर अर्चिते ! वर्सा सिला नाथ -दायिते  ! दयनिधेअत्र्यदि - सप्तऋषयासमुपास्या  संध्यामअक्सासिन्धु -कमलानी मनोहरनी, आद्यपदयुगम  अर्चयितुम  प्रपन्ना  शेशाद्री -शेखर -विभो ! तव
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